Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.20 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.20

9.20
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥ ९-२० ॥
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca | amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna || 9-20 ||
— मैं ताप देता हूँ, मैं वर्षा ; — मैं रोकता और बरसाता हूँ ; — अमृत और मृत्यु ; — सत् और असत् मैं हूँ, हे अर्जुन

हे अर्जुन, मैं ताप देता हूँ, मैं वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ; मैं अमृत और मृत्यु भी हूँ, और सत् तथा असत् भी।