Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.17 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.17

9.17
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ ९-१७ ॥
ahaṃ kraturahaṃ yajñaḥ svadhāhamahamauṣadham | mantro'hamahamevājyamahamagnirahaṃ hutam || 9-17 ||
— मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ ; — स्वधा मैं, मैं औषध ; — मन्त्र मैं, मैं ही आज्य (घृत) ; — मैं अग्नि, मैं हवन

मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषध हूँ; मैं मन्त्र हूँ, मैं ही आज्य (घृत) हूँ, मैं अग्नि हूँ और मैं हवन (की क्रिया) हूँ।