ज्ञानयज्ञेन चाऽप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
९-१६ ॥
jñānayajñena cā'pyanye yajanto māmupāsate |
ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham ||
9-16 ||
और दूसरे ज्ञानयज्ञ के द्वारा भी एकत्व से, पृथक्त्व से, अनेक प्रकार से, विश्वतोमुख (सर्वव्यापी) मुझको पूजते हुए मेरी उपासना करते हैं।