Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.16 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.16

9.16
ज्ञानयज्ञेन चाऽप्यन्ये यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ ९-१६ ॥
jñānayajñena cā'pyanye yajanto māmupāsate | ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham || 9-16 ||
— और दूसरे ज्ञानयज्ञ से भी ; — मुझे पूजते हुए उपासना करते हैं ; — एकत्व से, पृथक्त्व से ; — अनेक प्रकार से, विश्वतोमुख को

और दूसरे ज्ञानयज्ञ के द्वारा भी एकत्व से, पृथक्त्व से, अनेक प्रकार से, विश्वतोमुख (सर्वव्यापी) मुझको पूजते हुए मेरी उपासना करते हैं।