Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 9.11 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)9.11

9.11
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् । हेतुनानेन कौन्तेय जगद् विपरिवर्तते ॥ ९-११ ॥
mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram | hetunānena kaunteya jagad viparivartate || 9-11 ||
— मुझ अध्यक्ष के सान्निध्य में प्रकृति ; — चराचर को उत्पन्न करती है ; — इसी हेतु से, हे कुन्तीपुत्र ; — जगत् घूमता रहता है

हे कुन्तीपुत्र, मुझ अध्यक्ष के सान्निध्य में प्रकृति चराचर (जगत्) को उत्पन्न करती है; इसी हेतु से यह जगत् घूमता रहता है।