मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद् विपरिवर्तते ॥
९-११ ॥
mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ sūyate sacarācaram |
hetunānena kaunteya jagad viparivartate ||
9-11 ||
हे कुन्तीपुत्र, मुझ अध्यक्ष के सान्निध्य में प्रकृति चराचर (जगत्) को उत्पन्न करती है; इसी हेतु से यह जगत् घूमता रहता है।