Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 8.18 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)8.18

8.18
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ ८-१८ ॥
avyaktādvyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgame | rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake || 8-18 ||
— अव्यक्त से समस्त व्यक्तियाँ ; — दिन के आगमन पर उत्पन्न होती हैं ; — रात्रि के आगमन पर लीन हो जाती हैं ; — उसी अव्यक्त नाम वाले में

दिन के आगमन पर अव्यक्त से समस्त व्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं; और रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त नाम वाले में लीन हो जाती हैं।