Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.25 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.25

7.25
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ ७-२५ ॥
nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya yogamāyāsamāvṛtaḥ | mūḍho'yaṃ nābhijānāti loko māmajamavyayam || 7-25 ||
— मैं सबके लिए प्रकट नहीं ; — योगमाया से आवृत ; — यह मूढ़ नहीं पहचानता ; — लोक मुझ अज, अव्यय को

मैं अपनी योगमाया से आवृत होकर सबके लिए प्रकट नहीं हूँ; यह मोहित लोक मुझ अज और अव्यय को नहीं पहचानता।