Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.18 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.18

7.18
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतः । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ ७-१८ ॥
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me mataḥ | āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmevānuttamāṃ gatim || 7-18 ||
— ये सभी उदार हैं ; — किन्तु ज्ञानी को मैं अपना आत्मा मानता हूँ ; — क्योंकि वह युक्त आत्मा स्थित है ; — मुझमें ही, अनुत्तम गति-स्वरूप

ये सभी उदार हैं, किन्तु ज्ञानी को तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ; क्योंकि वह युक्त आत्मा अनुत्तम गति-स्वरूप मुझमें ही स्थित है।