Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 7.17 / 30

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)7.17

7.17
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ ७-१७ ॥
teṣāṃ jñānī nityayukta ekabhaktirviśiṣyate | priyo hi jñānino'tyarthamahaṃ sa ca mama priyaḥ || 7-17 ||
— इनमें ज्ञानी, नित्ययुक्त ; — एकभक्ति वाला श्रेष्ठ है ; — क्योंकि ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ ; — मैं, और वह मुझे प्रिय है

इनमें नित्ययुक्त और एकभक्ति वाला ज्ञानी श्रेष्ठ है; क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।