Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 6.43 / 49

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)6.43

6.43
प्राप्य पुण्यकृतांल्लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ६-४३ ॥
prāpya puṇyakṛtāṃllokānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ | śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe yogabhraṣṭo'bhijāyate || 6-43 ||
— पुण्यकर्मियों के लोकों को प्राप्त करके ; — अनेक वर्षों तक रहकर ; — पवित्र और श्रीमानों के घर में ; — योगभ्रष्ट जन्म लेता है

योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यकर्म करने वालों के लोकों को प्राप्त करके, अनेक वर्षों तक वहाँ रहकर, पवित्र और श्रीमान् लोगों के घर में जन्म लेता है;