Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.24 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.24

5.24
अन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथाऽन्तर्ज्योतिरेव यः । स पार्थ परमं योगं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ ५-२४ ॥
antaḥsukho'ntarārāmastathā'ntarjyotireva yaḥ | sa pārtha paramaṃ yogaṃ brahmabhūto'dhigacchati || 5-24 ||
— भीतर सुख वाला, भीतर रमण करने वाला ; — और भीतर ही ज्योतिर्मय ; — वह, हे पार्थ, परम योग को ; — ब्रह्मभूत होकर प्राप्त करता है

हे पार्थ, जो भीतर ही सुख वाला, भीतर ही रमण करने वाला और भीतर ही ज्योतिर्मय है, वह ब्रह्मभूत होकर ब्रह्मनिर्वाण रूपी परम योग को प्राप्त करता है।