Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.23 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.23

5.23
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोचनात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी मतः ॥ ५-२३ ॥
śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prākśarīravimocanāt | kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī mataḥ || 5-23 ||
— जो इसी लोक में सहन करने में समर्थ ; — शरीर त्यागने से पूर्व ; — काम-क्रोध से उत्पन्न वेग को ; — वह युक्त, वह सुखी माना गया

जो इसी लोक में, शरीर त्यागने से पूर्व ही, काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है, वह युक्त है और वही सुखी माना गया है।