Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.21 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.21

5.21
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमव्यमश्नुते ॥ ५-२१ ॥
bāhyasparśeṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham | sa brahmayogayuktātmā sukhamavyamaśnute || 5-21 ||
— बाह्य स्पर्शों में अनासक्त आत्मा ; — आत्मा में जो सुख है उसे पाता है ; — वह ब्रह्म-योग में युक्त आत्मा ; — अक्षय सुख का अनुभव करता है

बाह्य स्पर्शों (विषयों) में अनासक्त आत्मा वाला पुरुष आत्मा में जो सुख है उसे पाता है; वह ब्रह्म-योग में युक्त आत्मा वाला अक्षय सुख का अनुभव करता है।