Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 5.20 / 29

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)5.20

5.20
न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ ५-२० ॥
na prahṛṣyet priyaṃ prāpya nodvijetprāpya cāpriyam | sthirabuddhirasammūḍho brahmavid brahmaṇi sthitaḥ || 5-20 ||
— प्रिय पाकर हर्षित न हो ; — और अप्रिय पाकर उद्विग्न न हो ; — स्थिरबुद्धि, मोहरहित ; — ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित

प्रिय को पाकर हर्षित न हो और अप्रिय को पाकर उद्विग्न न हो; स्थिरबुद्धि, मोहरहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित रहता है।