न प्रहृष्येत् प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥
५-२० ॥
na prahṛṣyet priyaṃ prāpya nodvijetprāpya cāpriyam |
sthirabuddhirasammūḍho brahmavid brahmaṇi sthitaḥ ||
5-20 ||
प्रिय को पाकर हर्षित न हो और अप्रिय को पाकर उद्विग्न न हो; स्थिरबुद्धि, मोहरहित ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म में स्थित रहता है।