Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.31 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.31

4.31
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ४-३१ ॥
yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam | nāyaṃ loko'styayajñasya kuto'nyaḥ kurusattama || 4-31 ||
— यज्ञावशेष रूपी अमृत भोगने वाले ; — सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ; — यज्ञरहित के लिए यह लोक भी नहीं ; — फिर परलोक कहाँ, हे कुरुश्रेष्ठ

यज्ञ के अवशेष रूपी अमृत को भोगने वाले सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं; हे कुरुश्रेष्ठ, यज्ञरहित के लिए यह लोक भी नहीं, फिर परलोक कहाँ?