Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.30 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.30

4.30
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ ४-३० ॥
apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati | sarve'pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ || 4-30 ||
— दूसरे नियमित आहार वाले ; — प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं ; — ये सब यज्ञ के ज्ञाता ; — यज्ञ से पाप नष्ट किए हुए

दूसरे नियमित आहार वाले प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं; ये सब यज्ञ के ज्ञाता हैं, जिनके पाप यज्ञ से नष्ट हो गए हैं।