Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.29 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.29

4.29
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे । प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ ४-२९ ॥
apāne juhvati prāṇaṃ prāṇe'pānaṃ tathā'pare | prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ || 4-29 ||
— अपान में प्राण का हवन करते हैं ; — प्राण में अपान का, वैसे दूसरे ; — प्राण-अपान की गति रोककर ; — प्राणायाम में तत्पर

कुछ लोग प्राण को अपान में और अपान को प्राण में हवन करते हैं, तथा प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम में तत्पर रहते हैं।