Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.32 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.32

4.32
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे । कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥ ४-३२ ॥
evaṃ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe | karmajānviddhi tānsarvānevaṃ jñātvā vimokṣyase || 4-32 ||
— इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ ; — ब्रह्म के मुख के समक्ष विस्तृत ; — उन सबको कर्म से उत्पन्न जान ; — ऐसा जानकर तू मुक्त हो जाएगा

इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ ब्रह्म के मुख के समक्ष विस्तृत हैं; उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो; ऐसा जानकर तू मुक्त हो जाएगा।