Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 4.33 / 42

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)4.33

4.33
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ ४-३३ ॥
śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa | sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyate || 4-33 ||
— द्रव्यमय यज्ञ से श्रेष्ठ ; — ज्ञानयज्ञ, हे परन्तप ; — समस्त कर्म पूर्णतः, हे पार्थ ; — ज्ञान में पर्यवसित होते हैं

हे परन्तप, द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है; हे पार्थ, समस्त कर्म पूर्णतः ज्ञान में ही पर्यवसित (परिसमाप्त) होते हैं।