Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.5 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.5

3.5
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥ ३-५ ॥
na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt | kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ || 3-5 ||
— क्योंकि कोई भी क्षणमात्र भी कभी ; — कर्म किए बिना नहीं रहता ; — क्योंकि विवश होकर कर्म कराया जाता है ; — सब प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा

क्योंकि कोई भी कभी क्षणमात्र भी कर्म किए बिना नहीं रहता; सब प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा विवश होकर कर्म करने को बाध्य किए जाते हैं।