कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मूढाचारः स उच्यते ॥
३-६ ॥
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran |
indriyārthānvimūḍhātmā mūḍhācāraḥ sa ucyate ||
3-6 ||
जो कर्मेन्द्रियों को संयत करके मन से इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता हुआ बैठता है, वह मूढ़चित्त वाला पुरुष मिथ्याचारी (पाखण्डी) कहलाता है।