Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.6 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.6

3.6
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मूढाचारः स उच्यते ॥ ३-६ ॥
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran | indriyārthānvimūḍhātmā mūḍhācāraḥ sa ucyate || 3-6 ||
— कर्मेन्द्रियों को संयत करके ; — जो मन से स्मरण करता हुआ बैठता है ; — इन्द्रियों के विषयों का ; — वह मूढ़चित्त मिथ्याचारी कहलाता है

जो कर्मेन्द्रियों को संयत करके मन से इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता हुआ बैठता है, वह मूढ़चित्त वाला पुरुष मिथ्याचारी (पाखण्डी) कहलाता है।