Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.7 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.7

3.7
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥ ३-७ ॥
yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate'rjuna | karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate || 3-7 ||
— किन्तु जो मन से इन्द्रियों को नियन्त्रित करके ; — आरम्भ करता है ; — हे अर्जुन ; — कर्मेन्द्रियों से अनासक्त होकर कर्मयोग ; — वह श्रेष्ठ है

किन्तु हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को नियन्त्रित करके कर्मेन्द्रियों से अनासक्त होकर कर्मयोग का आरम्भ करता है, वह श्रेष्ठ है।