Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.19 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.19

3.19
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥ ३-१९ ॥
karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ | lokasaṃgrahamevāpi sampaśyankartumarhasi || 3-19 ||
— क्योंकि कर्म के द्वारा ही संसिद्धि को ; — जनक आदि प्राप्त हुए ; — लोकसंग्रह को भी ध्यान में रखते हुए ; — विचार करके तुझे कर्म करना उचित है

क्योंकि जनक आदि कर्म के द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुए थे; लोकसंग्रह को भी ध्यान में रखते हुए तुम्हें कर्म करना उचित है।