Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.20 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.20

3.20
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३-२० ॥
yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ | sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate || 3-20 ||
— श्रेष्ठ जो-जो आचरण करता है ; — वही-वही अन्य लोग (करते हैं) ; — वह जो प्रमाण (आदर्श) स्थापित करता है ; — लोक उसी का अनुसरण करता है

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही करते हैं; वह जो प्रमाण (आदर्श) स्थापित करता है, लोक उसी का अनुसरण करता है।