Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.20
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
३-२० ॥
yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ |
sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate ||
3-20 ||
— श्रेष्ठ जो-जो आचरण करता है ; — वही-वही अन्य लोग (करते हैं) ; — वह जो प्रमाण (आदर्श) स्थापित करता है ; — लोक उसी का अनुसरण करता है श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वही करते हैं; वह जो प्रमाण (आदर्श) स्थापित करता है, लोक उसी का अनुसरण करता है।