Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.21 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.21

3.21
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यं प्रवर्तेऽथ च कर्मणि ॥ ३-२१ ॥
na me pārthāsti kartavyaṃ triṣu lokeṣu kiñcana | nānavāptamavāptavyaṃ pravarte'tha ca karmaṇi || 3-21 ||
— हे पार्थ, मेरे लिए कुछ कर्तव्य नहीं ; — तीनों लोकों में कुछ भी ; — न कोई अप्राप्त जिसे प्राप्त करना हो ; — फिर भी मैं कर्म में प्रवृत्त रहता हूँ

हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ भी कर्तव्य नहीं है, न कोई अप्राप्त वस्तु है जिसे मुझे प्राप्त करना हो — फिर भी मैं कर्म में प्रवृत्त रहता हूँ।