Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.16 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.16

3.16
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥ ३-१६ ॥
evaṃ pravartitaṃ cakraṃ nānuvartayatīha yaḥ | aghāyurindriyārāmo moghaṃ pārtha sa jīvati || 3-16 ||
— इस प्रकार प्रवर्तित चक्र का ; — जो इस लोक में अनुसरण नहीं करता ; — पापमय जीवन वाला, इन्द्रियों में रमने वाला ; — वह व्यर्थ ही जीता है, हे पार्थ

हे पार्थ, इस प्रकार प्रवर्तित किए गए चक्र का जो इस लोक में अनुसरण नहीं करता, वह पापमय जीवन वाला और इन्द्रियों में रमने वाला व्यर्थ ही जीता है।