कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥
३-१५ ॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam |
tasmāt sarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam ||
3-15 ||
कर्म को ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न जानो और ब्रह्म को अक्षर से उत्पन्न; अतः सर्वव्यापी ब्रह्म नित्य ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।