Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.15 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.15

3.15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् । तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ ३-१५ ॥
karma brahmodbhavaṃ viddhi brahmākṣarasamudbhavam | tasmāt sarvagataṃ brahma nityaṃ yajñe pratiṣṭhitam || 3-15 ||
— कर्म को ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न जान ; — ब्रह्म को अक्षर से उत्पन्न ; — अतः सर्वव्यापी ब्रह्म ; — नित्य यज्ञ में प्रतिष्ठित है

कर्म को ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न जानो और ब्रह्म को अक्षर से उत्पन्न; अतः सर्वव्यापी ब्रह्म नित्य ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।