Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 3.17 / 48

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)3.17

3.17
यश्चात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ ३-१७ ॥
yaścātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ | ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate || 3-17 ||
— किन्तु जो आत्मा में ही रमण करने वाला हो ; — और आत्मा में तृप्त मनुष्य ; — और आत्मा में ही सन्तुष्ट ; — उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं रहता

किन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला, आत्मा में ही तृप्त, और आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।