Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 2.37 / 74

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)2.37

2.37
अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ २-३७ ॥
avācyavādāṃśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ | nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim || 2-37 ||
— और अनेक न कहने योग्य वचन ; — तेरे शत्रु कहेंगे ; — तेरे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए ; — उससे बढ़कर दुःख क्या

और तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए अनेक न कहने योग्य वचन कहेंगे; उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?