अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥
२-३७ ॥
avācyavādāṃśca bahūnvadiṣyanti tavāhitāḥ |
nindantastava sāmarthyaṃ tato duḥkhataraṃ nu kim ||
2-37 ||
और तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए अनेक न कहने योग्य वचन कहेंगे; उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?