Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 17.6 / 28

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)17.6

17.6
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतनम् । मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ १७-६ ॥
karṣayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetanam | māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tānviddhyāsuraniścayān || 17-6 ||
— शरीर में स्थित को कष्ट देते हुए ; — अचेतन भूत-समूह को ; — और शरीर के भीतर स्थित मुझको भी ; — उन्हें आसुर निश्चय वाला जान

शरीर में स्थित अचेतन भूत-समूह को, और शरीर के भीतर स्थित मुझको भी कष्ट देते हुए — उन्हें आसुर निश्चय वाला जान।