Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.20 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.20

16.20
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ १६-२० ॥
āsurīṃ yonimāpannā mūḍhā janmani janmani | māmaprāpyaiva kaunteya tato yāntyadhamāṃ gatim || 16-20 ||
— आसुरी योनि को प्राप्त ; — मूढ़, जन्म-जन्म में ; — मुझे न पाकर ही, हे कुन्तीपुत्र ; — उससे (और) अधम गति को जाते हैं

हे कुन्तीपुत्र, आसुरी योनि को प्राप्त मूढ़ लोग जन्म-जन्म में मुझे न पाकर ही, उससे (और) अधम गति को प्राप्त होते हैं।