Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.18 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.18

16.18
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः । मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ १६-१८ ॥
ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ | māmātmaparadeheṣu pradviṣanto'bhyasūyakāḥ || 16-18 ||
— अहंकार, बल, दर्प ; — काम, क्रोध का आश्रय लेकर ; — मुझसे, अपने-दूसरों के शरीरों में ; — द्वेष करने वाले, दोषदृष्टि वाले

अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करने वाले वे दोषदृष्टि वाले होते हैं।