Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 16.17 / 24

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)16.17

16.17
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधपूर्वकम् ॥ १६-१७ ॥
ātmasambhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ | yajante nāmayajñaiste dambhenāvidhapūrvakam || 16-17 ||
— अपने को बड़ा मानने वाले, अकड़ वाले ; — धन-मान के मद से युक्त ; — वे नाममात्र के यज्ञों से यजन करते हैं ; — दम्भ के साथ, अविधिपूर्वक

अपने को बड़ा मानने वाले, अकड़ वाले, धन और मान के मद से युक्त वे लोग नाममात्र के यज्ञों से दम्भ के साथ, अविधिपूर्वक यजन करते हैं।