Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.8 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.8

15.8
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ १५-८ ॥
śarīraṃ yadavāpnoti yaccāpyutkrāmatīśvaraḥ | gṛhītvaitāni saṃyati vāyurgandhānivāśayāt || 15-8 ||
— जिस शरीर को प्राप्त करता है ; — और जिससे ईश्वर (जीव) उत्क्रमण करता है ; — इन (इन्द्रियों) को साथ लेकर जाता है ; — जैसे वायु अपने स्थान से गन्धों को

ईश्वर (जीव) जिस शरीर को प्राप्त करता है और जिससे उत्क्रमण (प्रस्थान) करता है, उन (इन्द्रियों) को साथ लेकर जाता है, जैसे वायु अपने स्थान से गन्धों को।