Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.9 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.9

15.9
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ १५-९ ॥
śrotraṃ cakṣuḥ sparśanaṃ ca rasanaṃ ghrāṇameva ca | adhiṣṭhāya manaścāyaṃ viṣayānupasevate || 15-9 ||
— श्रोत्र, चक्षु और स्पर्शन ; — रसन और घ्राण को ; — और मन को अधिष्ठित करके यह ; — विषयों का सेवन करता है

यह (जीव) श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शन, रसन और घ्राण को, तथा मन को अधिष्ठित करके विषयों का सेवन करता है।