Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.10 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.10

15.10
तिष्ठन्तमुत्क्रामन्तं वा भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १५-१० ॥
tiṣṭhantamutkrāmantaṃ vā bhuñjānaṃ vā guṇānvitam | vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ || 15-10 ||
— स्थित रहते, उत्क्रमण करते ; — अथवा गुणों से युक्त भोगते (जीव) को ; — मूढ़ लोग नहीं देखते ; — ज्ञान-चक्षु वाले देखते हैं

स्थित रहते हुए, उत्क्रमण करते हुए, अथवा गुणों से युक्त होकर भोगते हुए (जीव) को मूढ़ लोग नहीं देखते; ज्ञान-चक्षु वाले देखते हैं।