Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.11 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.11

15.11
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ १५-११ ॥
yatanto yoginaścainaṃ paśyantyātmanyavasthitam | yatanto'pyakṛtātmāno nainaṃ paśyantyacetasaḥ || 15-11 ||
— यत्न करते योगी इसे ; — आत्मा में स्थित देखते हैं ; — किन्तु अपरिष्कृत आत्मा वाले, यत्न करके भी ; — विवेकहीन इसे नहीं देखते

यत्न करने वाले योगी इसे आत्मा में स्थित देखते हैं; किन्तु अपरिष्कृत आत्मा वाले, विवेकहीन लोग यत्न करके भी इसे नहीं देखते।