Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.18 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.18

15.18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १५-१८ ॥
yasmātkṣaramatīto'hamakṣarādapi cottamaḥ | ato'smi loke vede ca prathitaḥ puruṣottamaḥ || 15-18 ||
— चूँकि मैं क्षर से अतीत ; — और अक्षर से भी उत्तम ; — इसी से लोक में और वेद में मैं ; — पुरुषोत्तम के रूप में प्रसिद्ध

चूँकि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसी से लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम के रूप में प्रसिद्ध हूँ।