Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.17 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.17

15.17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १५-१७ ॥
uttamaḥ puruṣastvanyaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ | yo lokatrayamāviśya bibhartyavyaya īśvaraḥ || 15-17 ||
— किन्तु उत्तम पुरुष अन्य ; — परमात्मा ऐसा कहा गया ; — जो तीनों लोकों में प्रवेश करके ; — उन्हें धारण करता है, अव्यय ईश्वर

किन्तु उत्तम पुरुष अन्य है, जो परमात्मा कहा गया है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उन्हें धारण करता है — वह अव्यय ईश्वर है।