Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 15.16 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)15.16

15.16
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १५-१६ ॥
dvāvimau puruṣau loke kṣaraścākṣara eva ca | kṣaraḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭastho'kṣara ucyate || 15-16 ||
— लोक में ये दो पुरुष ; — क्षर और अक्षर ; — क्षर समस्त भूत ; — कूटस्थ अक्षर कहलाता है

लोक में ये दो पुरुष हैं — क्षर और अक्षर; क्षर समस्त भूत हैं, और कूटस्थ अक्षर कहलाता है।