Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.5 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.5

14.5
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ १४-५ ॥
sattvaṃ rajastama iti guṇāḥ prakṛtisambhavāḥ | nibadhnanti mahābāho dehe dehinamavyayam || 14-5 ||
— सत्त्व, रजस्, तमस् — ये गुण ; — प्रकृति से उत्पन्न ; — बाँधते हैं, हे महाबाहु ; — देह में अव्यय देही को

हे महाबाहु, सत्त्व, रजस् और तमस् — ये प्रकृति से उत्पन्न गुण अव्यय देही को देह में बाँधते हैं।