Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 14.6 / 27

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)14.6

14.6
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ १४-६ ॥
tatra sattvaṃ nirmalatvātprakāśakamanāmayam | sukhasaṅgena badhnāti jñānasaṅgena cānagha || 14-6 ||
— उनमें सत्त्व निर्मलता के कारण ; — प्रकाशक और निरामय ; — सुख की आसक्ति से बाँधता है ; — और ज्ञान की आसक्ति से, हे निष्पाप

हे निष्पाप, उनमें सत्त्व निर्मलता के कारण प्रकाशक और निरामय है; यह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बाँधता है।