Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 13.27 / 35

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)13.27

13.27
यावत्किञ्चित्सम्भवति सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ १३-२७ ॥
yāvatkiñcitsambhavati sattvaṃ sthāvarajaṅgamam | kṣetrakṣetrajñasaṃyogāttadviddhi bharatarṣabha || 13-27 ||
— जो भी उत्पन्न होता है ; — स्थावर-जंगम प्राणी ; — क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के संयोग से ; — उसे जान, हे भरतर्षभ

हे भरतर्षभ, जो भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होता है, उसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जान।