अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥
१३-२६ ॥
anye tvevamajānantaḥ śrutvānyebhya upāsate |
te'pi cātitarantyeva mṛtyuṃ śrutiparāyaṇāḥ ||
13-26 ||
किन्तु अन्य लोग इस प्रकार न जानते हुए, दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं; वे भी श्रुति के परायण होकर मृत्यु को पार कर जाते हैं।