अहावेशयितुं चित्तं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
१२-९ ॥
ahāveśayituṃ cittaṃ na śaknoṣi mayi sthiram |
abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanañjaya ||
12-9 ||
हे धनञ्जय, यदि तू मुझमें चित्त को स्थिर रूप से आविष्ट करने में समर्थ नहीं है, तो अभ्यासयोग के द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा कर।