Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.7 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.7

12.7
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १२-७ ॥
teṣāmahaṃ samuddhartā mṛtyusaṃsārasāgarāt | bhavāmi na cirātpārtha mayyāveśitacetasām || 12-7 ||
— उन का मैं उद्धार करने वाला ; — मृत्यु-संसार रूपी सागर से ; — बन जाता हूँ शीघ्र, हे पार्थ ; — मुझमें आविष्ट चित्त वालों का

हे पार्थ, मुझमें आविष्ट चित्त वाले उन (भक्तों) का मैं शीघ्र ही मृत्यु-संसार रूपी सागर से उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।