Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 12.6 / 20

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)12.6

12.6
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ १२-६ ॥
ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparāḥ | ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate || 12-6 ||
— किन्तु जो समस्त कर्मों को मुझमें ; — संन्यस्त करके, मेरे परायण ; — अनन्य योग से ही ; — मेरा ध्यान करते हुए उपासना करते हैं

किन्तु जो समस्त कर्मों को मुझमें संन्यस्त करके, मेरे परायण होकर, अनन्य योग से ही मेरा ध्यान करते हुए उपासना करते हैं —