एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥
११-३६ ॥
etacchrutvā vacanaṃ keśavasya kṛtāñjalirvepamānaḥ kirīṭī |
namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṃ sagadgadaṃ bhītabhītaḥ praṇamya ||
11-36 ||
केशव के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी (अर्जुन) ने हाथ जोड़कर, काँपते हुए, नमस्कार करके, अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके, गद्गद स्वर से कृष्ण से फिर कहा —