Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.37 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.37

11.37
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ॥ ११-३७ ॥
sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā jagatprahṛṣyatyanurajyate ca | rakṣāṃsi bhītāni diśo dravanti sarve namasyanti ca siddhasaṅghāḥ || 11-37 ||
— हे हृषीकेश, उचित ही है, आपकी कीर्ति से ; — जगत् हर्षित और अनुरक्त होता है ; — राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भागते हैं ; — और समस्त सिद्ध-समूह नमस्कार करते हैं

हे हृषीकेश, यह उचित ही है कि आपकी कीर्ति से जगत् हर्षित होता है और अनुरक्त होता है; राक्षस भयभीत होकर दिशाओं में भागते हैं, और समस्त सिद्ध-समूह नमस्कार करते हैं।