Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.35 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.35

11.35
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि लोकवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ ११-३५ ॥
droṇaṃ ca bhīṣmaṃ ca jayadrathaṃ ca karṇaṃ tathānyānapi lokavīrān | mayā hatāṃstvaṃ jahi mā vyathiṣṭhā yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān || 11-35 ||
— द्रोण को, भीष्म को, जयद्रथ को ; — कर्ण को, तथा अन्य लोकवीरों को भी ; — मेरे द्वारा मारे हुओं को तू मार, व्यथित मत हो ; — युद्ध कर, तू रण में शत्रुओं को जीतेगा

द्रोण को, भीष्म को, जयद्रथ को, कर्ण को, तथा अन्य लोकवीरों को भी, जो मेरे द्वारा (पहले से) मारे जा चुके हैं, तू मार; व्यथित मत हो। युद्ध कर, तू रण में शत्रुओं को जीतेगा।