Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)· 11.13 / 60

Bhagavad Gītā (Kashmirian recension)11.13

11.13
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ ११-१३ ॥
tatraikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ pravibhaktamanekadhā | apaśyaddevadevasya śarīre pāṇḍavastadā || 11-13 ||
— वहाँ एक स्थान पर समस्त जगत् ; — अनेक प्रकार से विभक्त ; — देखा, देवों के देव के ; — शरीर में पाण्डव ने तब

तब पाण्डव ने देवों के देव के शरीर में एक स्थान पर स्थित, अनेक प्रकार से विभक्त समस्त जगत् को देखा।